|
विश्वंभरी स्तुति |
|
पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक, स्वस्तिक सोफ्टेक इन्डिया |
|
>> Read In English, Gujrati Click
Here |
|
विश्वंभरी
अखिल
विश्वतणी
जनेता। विद्या धरी वदनमां
वसजो
विधाता॥ दुर्बुद्धि
दुर
करी
सद्दबुद्धि
आपो। माम्
पाहि
ॐ भगवती
भव दुःख कापो ॥१॥ भूलो
पडि
भवरने
भटकुं
भवानी। सुझे
नहि
लगीर
कोइ
दिशा
जवानी॥ भासे
भयंकर
वळी
मनना
उतापो। माम्
पाहि
ॐ भगवती
भव दुःख कापो ॥२॥ आ रंकने उगरवा नथी कोइ आरो। जन्मांध छु
जननी हु
ग्रही हाथ तारो॥ ना शुं सुणो भगवती शिशुना विलापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥३॥ मा कर्म जन्म कथनी करतां विचारु। आ सृष्टिमां तुज विना नथी कोइ मारु॥ कोने कहुं कठण काळ तणो बळापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥४॥ हुं काम क्रोध मध
मोह थकी भरेलो। आडंबरे अति धणो मद्थी छकेलो॥ दोषो बधा दूर करी माफ पापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥५॥ ना शास्त्रना श्रवणनु पयःपान पीधु। ना मंत्र के
स्तुति कथा नथी काइ कीधु॥ श्रद्धा धरी नथी कर्या तव
नाम जापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥६॥ रे रे
भवानी बहु भूल थई
ज मारी। आ जिंदगी थई
मने अतिशे अकारी॥ दोषो प्रजाळि सधळा तव
छाप छापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥७॥ खाली न कोइ स्थळ छे
विण आप
धारो। ब्रह्मांडमां अणु-अणु महीं वास तारो॥ शक्ति न माप गणवा अगणित मापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥८॥ पापो प्रपंच करवा बधी रीते पूरो। खोटो खरो भगवती पण
हुं तमारो॥ जाडयांधकार करी दूर सुबुद्धि स्थापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥९॥ शीखे सुणे रसिक छंद ज एक चित्ते। तेना थकी त्रिविध ताप टळे खचिते॥ बुद्धि विशेष जगदंब तणा प्रतापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥१०॥ श्री सदगुरु शरनमां रहीने यजुं छुं। रात्रि दिने भगवती तुजने भजुं छु॥ सदभक्त सेवक तणा परिताप चापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥११॥ अंतर विषे अधिक उर्मि थतां भवानी। गाऊ स्तुति तव
बळे नमीने मृडानी॥ संसारना सकळ रोग समूळ कापो। माम् पाहि ॐ भगवती भव
दुःख कापो ॥१२॥ |